Zakir Husain Biography President of india

भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन ईमानदार अंतःक्रियात्मक बहुत ईमानदार व्यक्ति की जीवनी हिंदी में। भारत में केवल शिक्षक और छात्र के लिए डॉ जाकिर हुसैन की धड़कन। जाकिर हुसैन प्रकृति के नेता थे, आज छतरों से बहुत ज्यादा प्यार करते हैं। डॉ जाकिर हुसैन कम में इतना ज्यादा व्यास्त रहते थे की वह अपना आत्मकथा भी नहीं लिखे हैं। 1962 में डॉ जाकिर हुसैन को भारत रत्न पुरस्कार से सम्मान किया गया था डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के साथ। डॉ जाकिर हुसैन खान का जन्म 8 फरवरी 1897 को हैदराबाद में हुआ।

Childhood Of Dr Zakir Husain

बहुत ही कम समय में उनका मन बाप दोंन ही चलवे से दिन छोटे सी उमर में उनको अपने छोटे से भाई और बहनो को सम्भलना पड़ा। इतनी बड़ी जिमेदारी उठा के बावजुद उन अकादमी से अपना ध्यान नहीं हटवाया। बाल्की उसमें एक सेल किया जिस्की वजह से लोगों को उन लोगों में एक नेता दिखलागा। इस्लिये इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पोस्ट ग्रेजुएशन करते हुए उन छात्रों के नेता निजुक्त किया गया है।

जो उनका इस तरह का पहला अनुभव था। स्टूडेंट को लीड करते हुए जाकिर जी ने अपनी श्रवण कौशल प्रति भी काम किया। ऑडियंस को बंधन राखी थी। असहयोग आंदोलन में छात्रों को जोड़ने के लिए दी जाने वाली एक भाषण ने जाकिर जी को इतना भाव कर प्रीत कर दिया की उन आंदोलन में हिसा लेने का निर्णय ले लिया। जाकिर जी अच्छे नेता होने के साथ-साथ एक पक्के राष्ट्रवादी भी थे।

contribution in Non-Cooperation Movement By Zakir Husain

जब शुद्ध देश में अंगरेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन की लहर शुरू हो रही थी तब जाकिर जी ने उसमें हिसा लेने के लिए अपनी पढाई बिच में ही छोड़ दी। उन अपना ज्यादा से ज्यादा समय में असहयोग आंदोलन को देना शुरू कर दिया पर वह दिल से शिक्षाविद् थे, उनके प्यार ने 23 साल के जाकिर जी को अंगरेजों के संचालन से मुक्त 1920 में राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय स्थापना करने की प्रेरणा दी।

नेशनल मुस्लिम यूनिवर्सिटी जिस हम आज जामिया मिलिया इस्लामिया के नाम से जाने हैं विश्व स्तर की शिक्षा देने के साथ-साथ भारत की युद्ध को अंगरेजों के खिलाफ यूनाइटेड करने में भी सक्रिय रूप से शामिल थी।

जामिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी को सही से चलने के लिए जाकिर जी ने इकोनॉमिक्स पे पीएचडी करने के लिए जर्मनी चले गए। लेकिन जल्दी ही लेकिन जल्द ही बहुत बड़ा झटका लगा जब उन पता चला फंड की कमी के करन जामिया कभी भी बंद हो सकती है, इस समय का समाधान निकाले के लिए भारत चले आए।

Zakir Husain Meet Gandhi to Request For Fund To Run zamia millia University

जहां वाह इस दिल से साबरमती आश्रम में महात्मा गांधी को मिले, जाकिर जी के राष्ट्रवादी का सोच शिक्षा के लिए उनका जुनून देख गांधीजी उनका सपना पूर्ण करने के लिए तय हो गए।

“If you need more funds(for the University),I am ready to beg”

-Mahatma Gandhi to Zakir Husain

गांधीजी बोले आपको रुपयों की दिककत है तो मैं भी मांग लूंगा। ज़ाकिर जी आखिरकर जामिया मिलिया इस्लामिया के लिए फ़ंड एकता करने में कामयाब रहे। और भारत की प्रीमियर यूनिवर्सिटी बैंड होने से बच गई। के खराब जाकिर साहेब जैसा सोचा था वही हुआ जामिया भारत की स्वतंत्र क्षण का केंद्र बना और वहां के छात्र शिक्षक ने लवन सत्याग्रह जैसा आंदोलन में हिसा लिया। खुद गांधीजी के बेटे देवदास भी वाहन शिक्षक रहे और जामिया हिंदू मुस्लिम एकता का एक उत्थान बन गया।

बस फिरसे क्या था जाकिर जी ने अब पूरी तरह खुद को शिक्षा के क्षेत्र में शामिल कर दिया था वो भारत के बुनियादी शिक्षा का सिलेबस बना रहा है कंपनी के चेयरमैन भी चुन गए।

क्या ड्राफ्टिंग कमेटी ने अंगरेजों की वजह भारतियों की नजरों से सिलेबस ड्राफ्ट किया है। जाकिर जी ने टीचर को बेसिक एजुकेशन से ट्रेन करने जामिया में एक स्कूल की स्थापना भी भारतीय शिक्षा को अंगरेजों के चंगुल से मुक्त करने में योगदन देने की देने के लिए और बेसिक एजुकेशन के करण उनको भारत सरकार ने 1963 में जान को से समनित किया।

बिहार के राज्यपाल उपाध्यक्ष पद संभलने वाले जाकिर जी की राजनीति में प्रवेश ग्लूकोमा की वजह से हुई हुई। लेकिन उन्होन 19607 के राष्ट्रपति चुनाव लड़े का फैसला किया और वह चुनाव जीतकर भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने।

राष्ट्रपति बनने के बुरे जब वाह एक साक्षात्कार के दौरा उनसे पूछा गया की भारत की पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बनने पर आपकी क्या प्रतिकिया है तो जवाब में दिया- मुझे खुशी होती अगर आप मेरे सूरज की बात ना की होती यह हमारी है। की देश के सारे नागरिक समान है और इसिलिए मैं राष्ट्रपति बनाना।

जाकिर जी का मन्ना था लोगों से उनकी जमीन ज्यादा अच्छी नहीं होती है लेकिन शिक्षा नहीं और उन्हें अपना पूरा जीवन भारत की युवाओं को शिक्षा करने में समरपित कर दी।

Political party force to win her candidate president of India election

कांग्रेस को डर था अगर ज़ाकिर हुसैन हर गए तो उनकी रजनीति सम्पत हो जाएगी। ऐसे में इंदिरा गांधी एक फॉर्मूला पेश किया उन्होन विपाक्षी डालों से कहां क्यों कांग्रेस लोकसभा और राज्य सभा में बहुत से हैं कितना भी कामजोर क्यों न सही इसलिय राष्ट्रपति पद प्रति कांग्रेस के उम्मीदवार को बैठाना चाहिए और राष्ट्रपति दल का पद ले। दीपक सिंह पार्टी को यह कांग्रेस की कमजोरी आत्मविश्‍वास विपक्ष पार्टी यह प्रस्‍ताव को ठुकरा दिया।

1967 के लोकसभा चुनाव में बुरे आए राष्ट्रपति के चुनाव जिस्में पुरा विपक्ष एक हो गया क्या वंपंथी पार्टीयां, स्वतंत्र पार्टी क्या जनसंघ या समाजवादी। आर्य साहब एकजुट हो गए थे के. सुभा राव लिए। मैं लगता था अगर राष्ट्रपति की चुनव में वह जीत गए तो कांग्रेस प्रति आखिरी बार भरपुर करने लायक उनकी क्षतिपूर्ति हो जाएगी। तब इंदिरा गांधी को याद मैं अपने पिता के मित्र गांधीवादी जयप्रकाश नारायण की।

Why did Indira need JP?

Indeed, an opposition party population was repeatedly saying that the public was not ready to accept Zakir Hussain, a Muslim, as the President of the country.

Indira remembered Jayaprakash Narayan, who held the Moral Consciousness Ethics Week. JP had retired from politics, yet he gave a political statement which became the headline of the newspaper on 22 April 1967.

Opposition religion should get out of the hybrid mentality, if Jakar Saheb is not elected President, then it will not be good for the unity of the country, the country will be divided into pieces.

– headline in news paper in 1967 By Jayaprakash

Saying this, all the intellectuals of JP started saying yes in favor of Zakir Hussain. Wrote from English newspaper Hindustan Time

If a true Muslim cannot be a nationalist then how can a true Hindu be.

– Hindustan times in 1967

उधार विदेशी मीडिया चुनाव को भारत के धर्मनिरपेक्षता के लिए एक लिटमस टेस्ट के तौर पर पेश कर रहा था। एक परीक्षण और था, कांग्रेस की और खाने का लड़ी का लेकिन कामरा और इंदिरा गांधी दानों को यह समाज एक गया था जो मूक पर वह अगर एक नहीं हुए तो कांग्रेस चुनवी रूप में बहुत कामजोर हो जाएगा हो सकता है मध्यावती बन जाएगा और तबियत सत्ता जिसके लिए जिसके अंदर रहे हैं वह भी हाथ में ना रहे। अर्थ कांग्रेस एक हो गया विपक्ष को कांग्रेस में क्रॉस वोटिंग उम्मिद थी और उसकी आशा कम हो गई।

Leave a Reply

Your email address will not be published.